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सोषाम॑विन्द॒त्स स्व१॒॑: सो अ॒ग्निं सो अ॒र्केण॒ वि ब॑बाधे॒ तमां॑सि । बृह॒स्पति॒र्गोव॑पुषो व॒लस्य॒ निर्म॒ज्जानं॒ न पर्व॑णो जभार ॥

English Transliteration

soṣām avindat sa svaḥ so agniṁ so arkeṇa vi babādhe tamāṁsi | bṛhaspatir govapuṣo valasya nir majjānaṁ na parvaṇo jabhāra ||

Pad Path

सः । उ॒षाम् । अ॒वि॒न्द॒त् । सः । स्व१॒॑रिति॑ स्वः॑ । सः । अ॒ग्निम् । सः । अ॒र्केण॑ । वि । ब॒बा॒धे॒ । तमां॑सि । बृह॒स्पतिः॑ । गोऽव॑पुषः । व॒लस्य॑ । निः । म॒ज्जान॑म् । न । पर्व॑णः । ज॒भा॒र॒ ॥ १०.६८.९

Rigveda » Mandal:10» Sukta:68» Mantra:9 | Ashtak:8» Adhyay:2» Varga:18» Mantra:3 | Mandal:10» Anuvak:5» Mantra:9


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सः-उषाम्) वह आत्मा अज्ञान को नष्ट करनेवाली ज्ञानज्योति को प्राप्त करता है (सः-स्वः) वह सुख को प्राप्त करता है (सः-अग्निम्) वह अपने शरीर के नायक परमात्मा को प्राप्त करता है (सः-अर्केण तमांसि विबबाधे) ज्ञानप्रकाशक मन्त्र से अज्ञान अन्धकारों को दूर करता है (गोवपुषः) वाणियों के शरीर अर्थात् वेद से (वलस्य) आवरक अज्ञान के (मज्जानम्) मज्जा के समान प्रभाव को (पर्वणः-निर्जभार) तृप्ति करनेवाले परमात्मज्ञान से नष्ट करता है-क्षीण करता है ॥९॥
Connotation: - आत्मा वेदप्रकाश के द्वारा अपने अन्दर से अज्ञानान्धकार को हटाकर परमात्मा का साक्षात्कार करता है। सब प्रकार के दुःखों से दूर होकर अनन्त सुख को भी प्राप्त करता है ॥९॥
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सः-उषाम्) “सुपां सुलुक्” [अष्टा० ७।१।३९] ‘इति सोर्लुक् पुनः सन्धिः’ स आत्माऽज्ञानदग्ध्रीं ज्ञानदीप्तिं लभते (सः-स्वः) स सुखं लभते (सः-अग्निम्) स्वशरीरस्य नायकं परमात्मानं लभते (सः-अर्केण तमांसि विबबाधे) ज्ञानप्रकाशकेन मन्त्रेणान्धकारान् दूरीकरोति (गोवपुषः) वाचां वपुषः-वेदात् (वलस्य) आवरकस्याज्ञानस्य (मज्जानम्) मज्जानमिव प्रभावं (पर्वणः-निर्जभार) तृप्तिकरेण परमात्मज्ञानेन निर्हरति ॥९॥